प्रकृति के काल चक्र में आज का भी समय चल रहा प्रत्येक व्यक्ति भौतिकता को ही मुख्य आधार मान कर चल रहा अपने वास्तविक परिवेश को विषमृत हो जा रहा भौतिक युग में भौतिकता को अपनाना कोई गलत नही परन्तु अपने मूल को भी पहचानना बहुत ही आवश्यक है । धर्म तर्क नहीं आस्था का विषय इसे किसी पे थोपा नहीं जा सकता । परन्तु आज धर्म का पालन करना मात्र कल्पना हो गया आज के पढ़े लिखे लोगों से धर्म के लिए पूंछा जाय तो अनपढों की भाँति वेद और धर्म शास्त्रों पर तर्क करते है ऐसे लोगों के लिए शास्त्रों में लिखा है कि उनसे तर्क न करें उन्हें छोड़ दे खास कर द्विजों के लिये है कि वो तो पूर्ण रूप से पतन का मार्ग प्रशस्त कर रहे इस लिए विद्वत जन उनसे दूर हो जायें तर्क न करें ।
योsवमन्येत ते मूले हेतुशास्त्राश्रयाद्विजः।
स साधुभिर्बहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दकः।।
अर्थात् - जो द्विज ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ) दोनों धर्म के मूलों ( वेद, धर्मशास्त्र ) पर तर्क करे अपमान करे वह नास्तिक और वेद निन्दक है साधु जनों को उसका त्याग कर देना चाहिए ।
Friday, 25 August 2017
धर्मपर तर्क करने वाले से बहस नही करना चाहिए उन्हें छोड़ दे ,
Saturday, 5 August 2017
7/08/2017 रक्षा बन्धन/ चन्द्र ग्रहण
रक्षा बन्धन
भाई बहन का मुख्य पर्व रक्षा बन्धन ७ अगस्त २०१७ को है ।
प्रातः १०:३० तक भद्रा है वैसे चन्द्रमा मकर राशि में है तो भद्रा स्वर्ग में है, तो ये भद्रा हानि कारक नहीं है । इस लिए यदि आप १०:३० के पहले भी बांधते है तो भी कोई हानि नहीं परंतु अपराह्न १४:४५ तक रक्षा बन्धन का कार्य सम्पन्न कर ले । क्यों कि अपराह्न १४:५३ पे चन्द्र ग्रहण का सूदक लग जायेगा ।
चन्द्र ग्रहण -
७ अगस्त २०१७ की रात्रि में लगने वाला ये चन्द्र ग्रहण साधको के लिए खास है । चूणामणि योग है इस ग्रहण में , ग्रहण से पहले अपने मंत्र को अधिक से अधिक जाप करें १ दिन पहले से ही संकल्प लेकर ग्रहण की अवधि तक एक निश्चित संख्या को पूरा करें और ग्रहण लगने पे स्नान करके बैठ जायें देव मूर्ति को ग्रहण काल में स्पर्श न करें ग्रहण काल में कुछ खाना पीना नहीं चाहिए , रोगी, शिशु के लिए छूट है । कुछ लोगों को हमने देखा है सूतक काल से ही मन्दिर बन्द कर देते है मूर्ति नहीं छूते ऐसा कोई विधान नहीं है सूतक काल में ऐसा कोई प्राविधान नही है । मात्र ग्रहण काल में ऐसा करना चाहिए सूतक काल में जप का अर्ध फल होता है इस लिए उस समय से बैठ जाना चाहिए । ग्रहण के अंतिम क्षण में हवन करें स्नान फिर चन्द्र अर्घ दें इससे आपकी मंत्र साधना का ग्रहण चरण पूर्ण होगा।
ग्रहण काल - स्पर्श - २२:५३, मध्य २३:५०, मोक्ष २४:४८,
द्वादश राशि पर ग्रहण का प्रभाव -
१ मेष - सुखम्, २ वृष - माननाश ,३ मिथुन - मृत्यु तुल्य कष्ट , ४ कर्क - स्त्रीपीड़ा, ५ सिंह - सौख्य, ६ कन्या - चिन्ता, ७ तुला - व्यथा, ८ वृश्चिक - श्री:, ९ धनु - क्षति , १० मकर - घात, ११ कुम्भ - हानि, १२ मीन - लाभ ।
Thursday, 3 August 2017
जीवन में कोई भी चीज सरल नहीं
जीवन एक भव सागर है । व्यक्ति भावनाओं में बहता रहता है और जो भी चीज दिखती है उसके प्रति लालायित होने लगता है । पर ये सम्भव नही दुनिया में प्रत्येक वस्तु या सम्बन्ध के आंत्रिक गुणों को प्राप्त करना असम्भव है । मनुष्य का ऐसा स्वभाव भी है कि अपनी चीज से अगले की चीज या सुख ज्यादा ही दिखता है उसको सन्तुष्टि नहीं होती। परन्तु सामने से दिखने वाली हर चीज वैसी नही होती जैसी दिखती है ये भी कटुक सत्य है, उसमे विकार अवस्य होता है । इसी प्रकार साधना के जीवन में भी यदि कोई व्यक्ति अलग साधना करता दिखता है तो उत्सुकता होती है कि इस साधना में क्या है जो मेरी वाली साधना में नहीं है । इसे भी पा लिया जाय पर भौतिक सुख में और साधनात्मक सुख में बहुत अन्तर है यदि आपने कोई भी साधना सुरु की और उसका आपकी साधना से विपरीत मार्ग है तो, आप न इधर के रहोगे न उधर के हाँ स्मरण करना अलग है । पर उस मार्ग पर अग्रसर होना ये खतरनाक है । जैसे आप सात्विक साधक है और आपने तान्त्रिक देव साधना की तो आपका सात्विक मार्ग बाधित हो जायेगा सात्विक देवता आपको छोड़ देगा । यदि तान्त्रिक साधना किया और साथ में किसी प्रेत या यक्षिणी साधना किया तो तान्त्रिक देवता आपको बचा तो लेगा पर कुछ समय में आपको छोड़ देगा । उसी प्रकार यदि आपने पिशाच साधना पहले किया बाद में देव साधना तो आपके प्राण भी जा सकते है । वैसे तो कोई भी साधना या अभीष्ट प्राप्ति का मार्ग सरल कभी नही होता सरल वही होता है, जहाँ कुछ नहीं होता है। यदि आपको कोई बड़ी उपलब्धि या बड़ी सिद्धि प्राप्त करनी है तो खतरों से तो खेलना ही पड़ेगा । शास्त्रों में भी कहा गया है -
न संशयमनारुहय नरो भद्राणि पश्यन्ति।
संशयं पुनरारुह्य यदि जीवति पश्यन्ति ।।
अर्थ - मनुष्य अपने को खतरे में डाले बिना विशिष्ट लाभ नहीं पा सकता यदि खतरे से बच गया तो उस लाभ का सुख वह भोगता ही है ।।
इस लिए दिल से एक ही साधनात्म मार्ग पर चलना चाहिए और डरना नही चाहिए यदि कोई अच्छा गुरु मिले तो सर्वोपरि है। हमारे लेख का मतलब यह नहीं कि आप डर जाओ या अनावश्यक कहीं जा के कूद पड़ो की यहाँ खतरा है तो ये मार्ग सही है । हमारा अभिप्राय है कि जिस लक्ष्य को भी हम अपनायें उसी पर पूरा ध्यान केन्द्रित करें क्यों कि कोई भी मार्ग सरल नहीं होता है ।।
Sunday, 9 July 2017
त्रिपुण्ड और रुद्राक्ष बिना धारण किये , शिव उपासना का फल नही
Monday, 12 June 2017
शिव उपासना से सुख और दुःख भी है
Friday, 19 May 2017
इष्ट देवता बटुकभैरव है तो सब कुछ सम्भव है
श्री बटुक भैरवनाथ जी की साधना एक दुर्लभ साधना है , जिनके साधक को कभी भयभीत नहीं होना चाहिए। ब्रह्माण्ड में बटुक भैरव साधना जैसी कोई साधना नहीं और यदि आप साधना के करीब आजाते है तो बाबा हर पल आपके साथ ही रहते है। एक परछाईं की तरह अपने भक्त का मार्ग दर्शन करते है। और किसी भी अरिष्ट शक्ति को वो अपने भक्त के समक्ष नहीं आने देते, किसी भी प्रकार का तन्त्र बटुक साधक पे काम नहीं करता। उसके बिपरीत जो इनके पीछे पड़ते है उनका सर्वश्व नष्ट हो जाता है । बटुक भैरव की साधना के लिए सबसे जरुरी और उपयोगी तुरीय यानी मध्य रात्रि का समय 12am से 3:59 am तक का होता है। इस समय को सिद्ध काल कहते है, यदि इस समय साधना नहीं हो पाती तो रात्रि 9 pm से 3:59am तक के मध्य का समय ग्रहण करें, इस समय को रात्रि पूजा में ग्रहण कर लिया जाता है । वैसे तो बाबा की पूजा में तुरीय संध्या का सबसे बड़ा स्थान है जिससे प्राणनाथ बाबा बटुकनाथ बहुत प्रशन्न हो जाते है ।
बाबा भाव पूर्ण पूजा या साधना के प्रेमी है । जो इनकी साधना मात्र स्वार्थ निमित्त करते है उनको सावधनी से करनी चाहिए । स्वार्थ निमित्त का अभिप्राय है कि कोई काम नहीं बन रहा मात्र उसके लिए या कोई और साधना कर रहे उसमें कोई दिक्कत या रुकावट आरही, कोई प्रेतबाधा आपके पीछे पड़ी है इस लिए कर रहे तो सावधानी से करें। जिस बात को लोग ज्यादा बोलते है कि बटुक भैरव या 64 भैरव में कोई भी भैरव बहुत क्रोधी है । वो ऐसे लोगों के लिए ही है । जो स्वार्थ निमित्त साधना करते है । और जो भगवान शिव के साधक है जो शिव के इस बाल रूप को आराध्य या कहें तो इष्ट मानते है उनको किन्चित मात्र नहीं डरना चाहिए उनपे बाबा कभी रुष्ट नहीं होते । यदि श्री बटुकभैरावनाथ इष्ट है तो आपके लिए जीवन में सब कुछ सम्भव है कोई भी चीज दुर्लभ नहीं है ।
विशेष :- रात्रि पूजा कभी खण्डित न हो इसपे विशेष ध्यान रखें । और जब भी कुछ खायें पियें कोशिश पूरी करें की वो सामग्री आपकी नजर में साफ हो, जूँठी न हो तब उसे मन से बाबा को समर्पित करें तभी खायें । ये दो सावधानी बटुक साधना में बहुत जरुरी है ।
जय बटुक भैरवनाथ
Wednesday, 19 April 2017
Shri Batuk Bhairav sadhna me jaruri ( Important points in Shri Batuk Bhairav sadhna )
जय बटुक भैरवनाथ
1. Sadhna of lord Batuk Bhairav or 64 Bhairav should not be done without a guru(holy teacher) and the guru himself should be the one who has done his sadhna, it is better if you have deeksha of lord Batuk Bhairav or Shiva from a guru. Batuk Bhairav sadhna is done by following 2 paths one is non vegetarian and other is vegetarian, it depends on what is the path followed by your guru. If one follows same path as his guru then it is beneficial.
2. Once you have started worshiping him then never stop it , else whatever you have gained with his blessings will be destroyed and it will become nearly impossible to please him again.
3. While worshiping him don't worship any other deity except lord Shiva and 10 Mahavidyas.
4. In Batuk sadhna the string of prayer beads should be made of 'Rudraksha' or 'black Hakik'. The holy mat(Asan) should be made of wool or deer skin. If it is of wool then it should not be of yellow or white color and neither the prayer beads nor the Asan should be shared with anyone.
5. In Batuk sadhna the South direction for worshiping is considered as most auspicious, the face of dia and the sadhak in South direction is considered to be most effective although you can worship in any direction except West.
6. During the period of sadhna a sadhak is supposed to wear black,red,orange and blue clothes only. 7. Sadhak should neither wear clothes of anyone nor he should lend his to others.
8. One should not eat anything without offering it to Lord. It is also illustrated by Adi Shankaracharya ji that " if food is kept in front of an animal he immediately starts eating it and if we do the same then what is the difference between human and animals" " we should thank the god for providing us the food and we should offer it to him in our mind and then ask permission to eat it.
9. The Ling puran quotes " if one is worshiping lord Shiva in any of his incarnations then Bhasm(ash) and Rudraksha are necessary, without them the blessings are reduced.
10. If you are doing sadhna of Batuk Bhairav then perform it in Bhairav temple or have your own triangle linga and worship it whole heartedly. One must also note that the Lord Bhairav not drown in water i.e one can't do his visarjan. Only after Keeping this fact in mind one should keep his linga or statue else he should worship on a photo. For further steps one should contact his guru.
11. Now let us know which day is auspicious for lord Batuk Bhairav and what type of food (Bhog) should be offered: commonly every day is auspicious for his worship but Sunday and Tuesday have the utmost importance. All sorts of food can be offered to him but it is known that he doesn't like light tasting stuffs.
Sweets: all sweets can be offered but Kalajam and Besan Ladoo are his favourite.
Fruits: all fruits are admired by our deity but among them Pomegranate has its own importance.
Flowers: all flowers can be offered except Pandanus Odorifer (Kewda ) .
Liquor is the special offering for lord Bhairav. The amount of liquor offered depend on ones own wish.
Note: Lord Shiva and Lord Bhairav should never be offered fruits, flowers of Pandanus Odorifer (Kewda) or something mixed with it not even the water of this flower should be sprinkled on him because this plant is cursed and offering any of its products will destroy all your worship.
Jay Batukbhairavnath.


