किसी भी व्यक्ति का बाल पका हो अवस्था हो गई हो, पढ़ा लिखा न हो या पढ़ा लिखा हो कर भी दूसरे का देख कर ही कार्य करे। विवेक का प्रयोग न करे तो वह बड़ा नहीं होता उसकी सलाह से नहीं चलना चाहिए । आयु में कम हो पढ़ा लिखा हो विवेक का प्रयोग करता हो मात्र दूसरों को न देखे अपने विवेक से निर्णय ले ऐसा व्यक्ति कम आयु का हो, तरुण अवस्था में भी हो तो उसे देवता भी वृद्ध मानते है । "दूसरों को देखने का हमारा भावार्थ ये नहीं कि दूसरों को नही देखना चाहिए या उनसे सीखना नही चाहिए । हमारा कहने का अभिप्राय है कि अनुभव लेना चाहिए ये बुद्धिमान का धर्म है । पर उसमें भविष्य को लेकर समझने की क्षमता हो कि इसका भविष्य में क्या फल होगा, मात्र वर्तमान और भूत में बीती बातों को ही प्रमाण मानें तो वह सम्मानित व्यक्ति नही क्यों कि वह अपने साथ दूसरों का भी भविष्य अन्धकार में ले जाता है" ।
ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य कुल में जन्म लेने से भी कोई बड़ा नही होता बिना ज्ञान के वो मूर्ख ही होता है । जैसे ब्राह्मण को ज्ञान के लिए जाना जाता है , इस लिए ब्राह्मण के अन्दर प्रत्येक प्रकार का ज्ञान आवश्यक है । उसमें मुख्य रूप से श्रुति यानी वेद का ज्ञान, देवी देवताओं के पूजन का और यज्ञ का इसके साथ साथ वर्तमान समय में चल रही स्थिति के अनुसार हर क्षेत्र का ज्ञान जरूरी है । यदि ऐसा नहीं है तो वह नाम के लिए ब्राह्मण है । जैसे काठ का हाँथी और मृत चर्म का हिरण । इस लिए सबसे बड़ा ज्ञान है । इस बात को शास्त्रों ने इस प्रकार कहा-
न तेन बृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः ।
यो वै युवाप्यधीयानस्तं देवा स्थविरं विदुः ।।
यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः।
यश्च विप्रोsनधीयानस्त्रयस्ते नाम बिभ्रति।।
अर्थात - सिरके बाल सफेद होने से कोई बड़ा नही होता । जिसकी अभी कम युवा है, जवान है, तरुण अवस्था में पढ़ा लिखा हो उसे देवता भी वृद्ध समझते हैं।।
काठ का हांथी, चमड़े का हिरण और बिना पढ़ा ब्राह्मण ये तीनो केवल नाम ही धारण करते है इन्हें केवल नाम के लिए बुलाया जा सकता है , कि ये हांथी है ये मृग है ये ब्राह्मण है । पर उनका अस्तित्व नही के बराबर ही होता है ।
Sunday, 27 August 2017
व्यक्ति आयु से नही ज्ञान से बड़ा होता है
Saturday, 26 August 2017
श्री बटुकभैरवनाथ से ज्यादा दयालु कोई नही
भगवान् बटुक भैरव की पूजा स्वयं में एक ऐसी साधना है जो कि आपकी कुण्डली का भाग्य या ब्रह्माण्ड में आपसे कोई कुपित हो या रुष्ट हो आपका कोई बाल बाका नहीं कर सकता है। बाबा की साधना कल्पवृक्ष के समान है ,जो आप कल्पना करते हो वह सब बाबा की सेवा और साधना से प्राप्त हो जाती है । इस बात में कोई संदेह नही है ! बस ध्यान इस बात का रखना पड़ता है कि श्री बटुक साधना के साथ कोई साधना नहीं की जाती जैसे एक पत्नी के लिए उसका पति ही सबकुछ है उसी भाँति हमें अपने दिल दिमांक में बाबा को ही रखना है। किन्तु वह पत्नी किसी का अपमान नही करती पूरे घर का सम्मान करती है । ठीक उसी प्रकार हमें किसी भी देवी देवता का अपमान नहीं करना पर दिल दिमांक में अपने बटुकनाथ को रखना है। श्याम शलोना सुन्दर सा मुखड़ा नटखट चितचोर पांव में घुंघुरू, कानों में कुण्डल , कमर में नाग की करधनी, त्रिनेत्रधारी, गले में रुद्राक्ष माला, एक हाँथ में मदिरा से भरा खप्पर और एक हाँथ में दण्ड लिए ऐसा सुन्दर सा रूप जिसकी एक नही 10 महाविद्या 64 योगिनियां जिसकी मां है । जिसके साथ रहती है ! कुत्तो के साथ खेलते है ऐसे मनोहारी रूप को कुछ लोग कहते है बहुत क्रोधी देवता है ये उनकी भूल है । मैं आपको बता दूं कि मेरे बाबा जैसा कोई देवता नहीं साक्षात शिव के इस बाल रूप को मैं क्रोधी नहीं मानता हाँ यदि अपने भक्त की रक्षा करना और उसके शत्रुओं का नष्ट करना क्रोध है तो मेरे बाबा बटुकनाथ से ज्यादा क्रोधी कोई नहीं है। अपने भक्त पर बाबा कभी क्रोधित नही होते है । हाँ बालक रूप है इस लिए कुछ नियम जरूर है । जैसे पूजा में कभी नागा न हो जो भी खायें उससे पहले बाबा स्मरण जरूर करें । आप रेलगाड़ी में हो या किसी भी यात्रा वाहन पे हो जाप और बाबा का स्मरण रात्रि काल में जरूर करें, फिर बाबा की माया आप पर सदैव बनी रहेगी। अब आपके दिमांक में होगा कि यात्रा में स्नान कैसे होगा तो सर्व प्रथम अपनी शुद्धता को देखें यदि आप मल मूत्र का त्याग करने के बाद स्नान नहीं किये तो सम्भव प्रयास करें कि कमर से स्नान कर लें वस्त्र बदल कर जाप करें।
यदि ये सम्भव न हो तो बटुक साधक को 2 माला रखनी चाहिए एक रुद्राक्ष और एक काला हकीक , शुद्ध की अवस्था में रुद्राक्ष से स्वच्छ न होने की स्थिति में हकीक से । स्त्रियों को मासिक धर्म के समय 5 दिन पूजा नही करनी चाहिए परन्तु जो बटुक साधिका हो वो उस समय में बिना माला के बिना मुह से बोले मन मे बाबा के मन्त्र का चिंतन करें । बाबा मेरे बहुत भोले और दयालु है , मैंने ऊपर कहा कि कल्प वृक्ष के समान है पर एक स्थान ऐसा आता है जहाँ कल्प वृक्ष भी छोटा पड़ जाता है । वो है मोक्ष की प्राप्ति कल्पवृक्ष मोक्ष नहीं दे सकता और बटुकनाथ की साधना से आप मृत्यु के बाद मोक्ष को भी प्राप्त कर सकते है । किसी भी प्रकार की श्री बटुक भैरव साधना से सम्बन्धित जानकारी के लिए , ईमेल या टिप्पड़ी (कमेंट) कर सकते है । जय बटुकभैरवनाथ
Friday, 25 August 2017
धर्मपर तर्क करने वाले से बहस नही करना चाहिए उन्हें छोड़ दे ,
प्रकृति के काल चक्र में आज का भी समय चल रहा प्रत्येक व्यक्ति भौतिकता को ही मुख्य आधार मान कर चल रहा अपने वास्तविक परिवेश को विषमृत हो जा रहा भौतिक युग में भौतिकता को अपनाना कोई गलत नही परन्तु अपने मूल को भी पहचानना बहुत ही आवश्यक है । धर्म तर्क नहीं आस्था का विषय इसे किसी पे थोपा नहीं जा सकता । परन्तु आज धर्म का पालन करना मात्र कल्पना हो गया आज के पढ़े लिखे लोगों से धर्म के लिए पूंछा जाय तो अनपढों की भाँति वेद और धर्म शास्त्रों पर तर्क करते है ऐसे लोगों के लिए शास्त्रों में लिखा है कि उनसे तर्क न करें उन्हें छोड़ दे खास कर द्विजों के लिये है कि वो तो पूर्ण रूप से पतन का मार्ग प्रशस्त कर रहे इस लिए विद्वत जन उनसे दूर हो जायें तर्क न करें ।
योsवमन्येत ते मूले हेतुशास्त्राश्रयाद्विजः।
स साधुभिर्बहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दकः।।
अर्थात् - जो द्विज ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ) दोनों धर्म के मूलों ( वेद, धर्मशास्त्र ) पर तर्क करे अपमान करे वह नास्तिक और वेद निन्दक है साधु जनों को उसका त्याग कर देना चाहिए ।
Saturday, 5 August 2017
7/08/2017 रक्षा बन्धन/ चन्द्र ग्रहण
रक्षा बन्धन
भाई बहन का मुख्य पर्व रक्षा बन्धन ७ अगस्त २०१७ को है ।
प्रातः १०:३० तक भद्रा है वैसे चन्द्रमा मकर राशि में है तो भद्रा स्वर्ग में है, तो ये भद्रा हानि कारक नहीं है । इस लिए यदि आप १०:३० के पहले भी बांधते है तो भी कोई हानि नहीं परंतु अपराह्न १४:४५ तक रक्षा बन्धन का कार्य सम्पन्न कर ले । क्यों कि अपराह्न १४:५३ पे चन्द्र ग्रहण का सूदक लग जायेगा ।
चन्द्र ग्रहण -
७ अगस्त २०१७ की रात्रि में लगने वाला ये चन्द्र ग्रहण साधको के लिए खास है । चूणामणि योग है इस ग्रहण में , ग्रहण से पहले अपने मंत्र को अधिक से अधिक जाप करें १ दिन पहले से ही संकल्प लेकर ग्रहण की अवधि तक एक निश्चित संख्या को पूरा करें और ग्रहण लगने पे स्नान करके बैठ जायें देव मूर्ति को ग्रहण काल में स्पर्श न करें ग्रहण काल में कुछ खाना पीना नहीं चाहिए , रोगी, शिशु के लिए छूट है । कुछ लोगों को हमने देखा है सूतक काल से ही मन्दिर बन्द कर देते है मूर्ति नहीं छूते ऐसा कोई विधान नहीं है सूतक काल में ऐसा कोई प्राविधान नही है । मात्र ग्रहण काल में ऐसा करना चाहिए सूतक काल में जप का अर्ध फल होता है इस लिए उस समय से बैठ जाना चाहिए । ग्रहण के अंतिम क्षण में हवन करें स्नान फिर चन्द्र अर्घ दें इससे आपकी मंत्र साधना का ग्रहण चरण पूर्ण होगा।
ग्रहण काल - स्पर्श - २२:५३, मध्य २३:५०, मोक्ष २४:४८,
द्वादश राशि पर ग्रहण का प्रभाव -
१ मेष - सुखम्, २ वृष - माननाश ,३ मिथुन - मृत्यु तुल्य कष्ट , ४ कर्क - स्त्रीपीड़ा, ५ सिंह - सौख्य, ६ कन्या - चिन्ता, ७ तुला - व्यथा, ८ वृश्चिक - श्री:, ९ धनु - क्षति , १० मकर - घात, ११ कुम्भ - हानि, १२ मीन - लाभ ।
Thursday, 3 August 2017
जीवन में कोई भी चीज सरल नहीं
जीवन एक भव सागर है । व्यक्ति भावनाओं में बहता रहता है और जो भी चीज दिखती है उसके प्रति लालायित होने लगता है । पर ये सम्भव नही दुनिया में प्रत्येक वस्तु या सम्बन्ध के आंत्रिक गुणों को प्राप्त करना असम्भव है । मनुष्य का ऐसा स्वभाव भी है कि अपनी चीज से अगले की चीज या सुख ज्यादा ही दिखता है उसको सन्तुष्टि नहीं होती। परन्तु सामने से दिखने वाली हर चीज वैसी नही होती जैसी दिखती है ये भी कटुक सत्य है, उसमे विकार अवस्य होता है । इसी प्रकार साधना के जीवन में भी यदि कोई व्यक्ति अलग साधना करता दिखता है तो उत्सुकता होती है कि इस साधना में क्या है जो मेरी वाली साधना में नहीं है । इसे भी पा लिया जाय पर भौतिक सुख में और साधनात्मक सुख में बहुत अन्तर है यदि आपने कोई भी साधना सुरु की और उसका आपकी साधना से विपरीत मार्ग है तो, आप न इधर के रहोगे न उधर के हाँ स्मरण करना अलग है । पर उस मार्ग पर अग्रसर होना ये खतरनाक है । जैसे आप सात्विक साधक है और आपने तान्त्रिक देव साधना की तो आपका सात्विक मार्ग बाधित हो जायेगा सात्विक देवता आपको छोड़ देगा । यदि तान्त्रिक साधना किया और साथ में किसी प्रेत या यक्षिणी साधना किया तो तान्त्रिक देवता आपको बचा तो लेगा पर कुछ समय में आपको छोड़ देगा । उसी प्रकार यदि आपने पिशाच साधना पहले किया बाद में देव साधना तो आपके प्राण भी जा सकते है । वैसे तो कोई भी साधना या अभीष्ट प्राप्ति का मार्ग सरल कभी नही होता सरल वही होता है, जहाँ कुछ नहीं होता है। यदि आपको कोई बड़ी उपलब्धि या बड़ी सिद्धि प्राप्त करनी है तो खतरों से तो खेलना ही पड़ेगा । शास्त्रों में भी कहा गया है -
न संशयमनारुहय नरो भद्राणि पश्यन्ति।
संशयं पुनरारुह्य यदि जीवति पश्यन्ति ।।
अर्थ - मनुष्य अपने को खतरे में डाले बिना विशिष्ट लाभ नहीं पा सकता यदि खतरे से बच गया तो उस लाभ का सुख वह भोगता ही है ।।
इस लिए दिल से एक ही साधनात्म मार्ग पर चलना चाहिए और डरना नही चाहिए यदि कोई अच्छा गुरु मिले तो सर्वोपरि है। हमारे लेख का मतलब यह नहीं कि आप डर जाओ या अनावश्यक कहीं जा के कूद पड़ो की यहाँ खतरा है तो ये मार्ग सही है । हमारा अभिप्राय है कि जिस लक्ष्य को भी हम अपनायें उसी पर पूरा ध्यान केन्द्रित करें क्यों कि कोई भी मार्ग सरल नहीं होता है ।।

