तान्त्रिक क्रिया का परिहार
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यदि किसी तान्त्रिक ने किसी के ऊपर तन्त्र क्रिया किया है ।
या किसी स्थान पे अरिष्ट बाधा का दोष है । या राहु, केतु,शनि की ग्रह पीड़ा से परेशान है तो अष्टोत्तरशतनाम का पाठ भैरव सप्ताह में करें कृष्ण पक्ष की रात्रि व्यापिनी अष्टमी से रात्रि व्यापिनी चतुर्दशी तक प्रति दिन १०० पाठ करें । हर १० पाठ के बाद एक माला जप करें और उसके बाद घी और सरसों के दाने को मिला के १०८ आहुति हवन करें । ११ बार तर्पण करें । १ बार मार्जन । इस प्रकार आपका अनुष्ठान पूरा होगा । और नित्य प्रति यथा शक्ति जप पाठ करते रहने से सुख शान्ति और वृद्धि का वास होगा ।
पाठ करने की विधि
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सर्व प्रथम स्नान करके सफेद या पीला रंग छोड़ किसी भी रंगीन वस्त्र में खास कर काला , लाल , नीला वस्त्र धारण कर दक्षिणाभिमुख बैठ कर बाबा के मूल मंत्र को बढ़ के आचमन करें ।
फिर हाँथ में जल लें और ११ बार मन्त्र पढ़ कर जल को चारो चारो तरफ अभिसिंचित कर लें । इसके बाद विनियोगः करें फिर न्यास करें । न्यास के बाद बाबा का ध्यान करें । ध्यान के बाद पाठ करें । यदि आप १ से अधिक पाठ के लिए बैठे हैं तो विनियोगः और न्यास ध्यान मात्र प्रारम्भ में किया जायेगा , उसके बाद पाठ का १४ श्लोक ही पाठ किया जायेगा उसी की आवृत्ति करते रहना है जब आपका अन्तिम पाठ हो तब फल श्रुति १ बार पढ़नी है । यह क्रम है । परन्तु यदि आपको बीच में मलया मूत्र के लिए उठना पड़े तो मल के बाद स्नान और मूत्र के बाद गुप्तांग प्रक्षालन करके पाठ के पहले का जितना क्रम बताया गया है वह पुनः करना पड़ेगा खास कर मल जाने के बाद ।।
अष्टोत्तरशतनाम पाठ
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विनियोगः
बटुकभैरवस्तोत्रमन्त्रस्य बृहदारण्यक ऋषिः अनुष्टुप्छन्द: श्रीमदापदुद्धारक-बटुकभैरवो देवता वं बीजं ह्रीं बटुकाय इति शक्ति: प्रणवः कीलकं ममाभीष्टसिद्धयर्थे पाठे विनियोगः ।
अथ ऋष्यादिन्यास:
बृहदारण्यकऋषये नमः - शिरसि
अनिष्टुप्छन्दसे नमः - मुखे
बं बीजाय नमः - गुह्ये
ह्रीं बटुकायेति शक्तये नमः - पादयो:
ॐ कीलकाय नमः - नाभौ
विनियोगाय नमः - सर्वाङ्गे
आथ करन्यास:
ॐ ह्रां वां - अङ्गुष्ठाभ्यां नमः
ॐ ह्रीं वीं - तर्जनीभ्यां नमः
ॐ ह्रूं वूं - मध्यमाभ्यां नमः
ॐ ह्रैं वैं - अनामिकाभ्यां
ॐ ह्रौं वौं - कनिष्काभ्यां नमः
ॐ ह्रः वः - करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः
आथ ह्रदयादिषडङ्गन्यास:
ॐ ह्रां वां हृदयाय नमः
ॐ ह्रीं वीं शिरसे स्वाहा
ॐ ह्रूं वूं शिखायै वषट्
ॐ ह्रैं वैं कवचाय हुम्
ॐ ह्रौं वौं नेत्रत्रयाय वौषट्
ॐ ह्रः वः अस्त्राय फट्
मूल पाठ -
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अष्टोत्तरशतं नाम्ना भैरवस्य महात्मनः।
मया ते कथितं देवि रहस्यं सर्वकामदम्।।
य इदं पठति स्तोत्रं नामाष्टशतमुत्तमम्।
न तस्य दुरितं किञ्चिन्न रोगेभ्यो भयं भवेत्।।
न च मारीभयं किञ्चिन्न च भूतभयं क्वचित्।
न शत्रुभ्यो भयं किञ्चित् प्राप्नुयान्मानवः क्वचित्।।
पातकेभ्यो भयं नैव यः पठेत् स्तोत्रमुत्तमम्।
मारी भये राजभये तथा चौराग्निजे भये।।
औत्पातिके महाघोरे तथा दुःस्वप्नदर्शने।
बन्धने च तथा घोरे पठेत् स्तोत्रमनुत्तमम्।।
सर्वप्रशममायाति भयं भैरवकीर्तनात्।
एकादशसहस्रन्तु पुरश्चरणमुच्यते।।
यस्त्रिसंध्यं पठेद्देवि संवत्सरमतन्द्रितः।
स सिद्धिं पाप्नुयादिष्टां दुर्लभामपि मानवः।।
षण्मासं भुमिकामस्तु जपित्वा प्राप्नुयान्महीम्।
राजशत्रुविनाशार्थं पठेन्मासाष्टकं पुनः।।
रात्रौ वारत्रयं चैव नाशयत्येव शात्रवान्।
जपेन्मासत्रयं मर्त्यो राजान वशमानयेत्।।
धनार्थी च सुतार्थी च दारार्थी चापि मानवः।
पठेन्मासत्रयं देवि वारमेकं तथा निशि।।
धनंपुत्रं तथा दारान् प्राप्नुयान्नात्र संशयः।
रोगी रोगात् प्रमुच्येत बद्धो मुच्येत बन्धनात्।
भीतो भयात् प्रमुच्येत तत्तदापन्न आपदः।।
निगडैश्चापि बद्धो यः कारागृहनिपातितः।
श्रृंखलाबन्धनं प्राप्तः पठेच्चैव दिवानिशम्।।
यान् यान् समीहते कामाँस्ताँस्तानाप्नोति मानवः।
अप्रकाश्यं परं गुह्यं न देयं यस्य कस्यचित्।।
सुकुलीनाय शान्ताय ऋजव दम्भवर्जिते।
दद्यात् स्त्रोत्रमिदं पुण्यं सर्वकामफलप्रदम्।।
य इदं पठते नित्यं धनधान्यमवाप्नुयात्।
-------------ॐ ह्रीं बटुकाय ह्रीं ॐ---------------


