Wednesday, 20 September 2017

अश्विन नवरात्रि व्रत /श्रीसंवत् 2074

विवरण -
प्रतिपदा - 21 सितम्बर 2017 गुरुवार , कलश स्थापन प्रातः 6 से 9:58 तक
अष्टमी -   28 सितम्बर 2017 गुरुवार, दशमहाविद्या हवन
नवमी  -   29 सितम्बर 2017 शुक्रवार, हवन , कन्याभोज ,
दशमी -   30  सितम्बर 2017 शनिवार , नवरात्रि व्रत पारण , विजयादशमी

आज हम नवरात्रि के ऊपर बतायेंगे ,, हिन्दू धर्म या कहें चराचर ब्रह्माण्ड में 4 संख्या का बहुत ही बड़ा स्थान है , चार वर्ण, चार वेद, चार शंकराचार्य और चार नवरात्रि ,, देवी उपासना में नवरात्रि का सर्वोच्च स्थान है । किसी देवता की उपासना बिना देवी उपासना के पूर्ण नहीं होती । इस लिए प्रत्येक साधक को किसी एक देवी की उपासना करनी चाहिए । यदि तन्त्र साधना करते है तो महा विद्या और यदि मात्र दैनिक उपासना करते है तो स्व रुचि के अनुसार दस विद्या या नव दुर्गा की उपासना करें । अब हम अपने मूल विषय पे बात करते है । नवरात्रि से स्पष्ट हो रहा कि यहां हम नव + रात्रि के संदर्भ में बात कर रहे, नवरात्रि को कैसे हम ग्रहण करते है ? ये जानिए ! नवरात्रि तिथि के आधार पे होती है। न कि ! दिन के आधार पे यदि किसी तिथि का क्षय हो जाये तो वह नवरात्रि 7 या 8 दिन की हो जाती है । यदि तिथि बढ़ जाये तो 10 दिन की भी हो जाती है । अब हम बात करते है प्रतिपदा की !  प्रतिपदा नवरात्रि का प्रथम दिन है । देवीपुराण और डामर तन्त्र के अनुसार जिस दिन अमावस्या हो उस दिन की प्रतिपदा को ग्रहण नहीं करना चाहिए । ये त्याज्य है। अधिकतर ब्राह्मण स्वलाभ या अज्ञानता में अमावस्या को जब प्रतिपदा लगती है तो कलश स्थापना करा देते है । डामर तन्त्र के अनुसार ये नवरात्रि के प्रभाव को क्षीण कर देता है । इस लिए उदयातिथि की नवरात्रि ही ग्रहण करना चाहिए , कभी ऐसा भी होता है कि प्रतिपदा का क्षय हो जाये तो  द्वितीया युक्त प्रतिपदा ही ग्रहण करना चाहिए । अमावस्या युक्त प्रतिपदा में पूजन करने से व्यक्ति संकट से घिर जाता है । निर्धन हो जाता है ऐसा स्कन्द पुराण में लिखा है । क्यो की देवीपुराण के अनुसार अश्विननवरात्रि की प्रतिपदा जिसके पुत्र सुख नही है उन्हें पुत्र सुख प्राप्त होता  है । अमावस्या युक्त प्रतिपदा पुत्र सुख का नाश करती है । इन प्रमाण को देख के रुद्रयामल तन्त्र का निर्णय है कि द्वितीया युक्त प्रतिपदा में ही व्रत और कलश पूजन करें ।
भगवती के जिस रूप की आप उपासना करते है । उनके मन्त्र जप करें , जयन्ती मङ्गला काली" इससे यथा शक्ति हवन करें । ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ।। इस मंत्र यथा शक्ति जप करे । भगवती के जिस रूप की उपासना करते है उनका पाठ करें । इस प्रकार प्रतिपदा से नवमी तक व्रत करें । भगवती यदि जागरण करना है तो अष्टमी या नवमी को करें । यदि इन दो दिन न हो सके तो षष्ठी को करें । दसमहाविद्या के उपासक अष्टमी में ही हवन करें। दुर्गा आदि शक्ति के उपासक नवमी में हवन करें । हवन के बाद यथा शक्ति कन्याओं को भोजन करायें । कन्या कैसी हों - कन्या 2 वर्ष से 10 वर्ष तक ही खिलानी या पूजन करना चाहिए उसके बाद वो त्याज्य है । 1 कुमारिका, 2 त्रिमूर्ति, 3 कल्याणी, 4 रोहिणी, 5 काली, 6 चण्डिका, 7 शाम्भवी, 8 दुर्गा, 9 श्रीमतीसुभद्रादेवी ,, इन नामों से यथा क्रम पूजन करना चाहिए । उदया तिथि के दशमी में वेद पाठी ब्राह्मण को भोजन करा के पारण करना चाहिए ।नवमी में पारण नहीं करना चाहिए । स्त्रियों को भी इसी प्रकार व्रत करना चाहिए, यदि वह व्रत में मध्य रजस्वला हो जायें तो किसी सुद्ध स्त्री, पति या ब्राह्मण से अपना पूजन करायें । स्वयं वहां से दूर रहे मन में भगवती का ध्यान करें । भूल से भी पूजन स्थली के सन्निकट न जायें । इस प्रकार नवरात्रि पूजन सम्पन्न करें । जय मां त्रिपुर सुन्दरी , जय बटुकनाथ।

Tuesday, 12 September 2017

साधनाओं में बलि प्रथा

आज हम एक ऐसे विषय पे चर्चा करेंगे, जो कि अधिकाधिक साधकों को सोचने पे विवस कर देता है । वो विषय है मांसाहार और शाकाहार बलि प्रथा से जुड़ा है और यह अत्यन्त गलत भी है । जब हम अपने सात्विक धार्मिक ग्रंथों पे दृष्टि गोचर करते है, जैसे रामायण, गीता, भागवत् , शिव पुराण, विष्णु पुराण तो ये ग्रंथ बताते है कि लाहशुन, प्याज, गाजर तक नहीं खाना चाहिए । तो मांसाहार का तो कोई प्रश्न ही नहीं उत्पन्न होता कि कहीं प्राप्त हो की मांस का सेवन आध्यात्मिक है । यही हमें हर धर्मानुयाई से श्रवण करने को प्राप्त होता है। पर जब हम किसी पहाड़ो के मन्दिर जाते है जैसे काली मन्दिर या मैदानी क्षेत्र में तारा, छिन्नमस्ता, बटुक भैरव , संहार भैरव का मन्दिर या किसी तान्त्रिक ग्रन्थ को देखते  है। तो हमें बलि प्रथा दिखाई पड़ती है।  तो हम संसय में पड़ जाते है कि ये क्या है ये भी तो देवी देवता है फिर इन्हें मांस क्यों चढ़ता है । तो आपको बता दें कि शिव और शक्ति की उपासना में 2 मार्ग होते है । एक बाम मार्ग और एक दक्षिण मार्ग दोनों की मार्ग अपने में शक्ति शाली है । बाम मार्ग पूर्ण रूप से तान्त्रिक क्रियाओं से ओत प्रोत है । परन्तु दक्षिण मार्ग सन्यासी संत महात्माओं से पूर्ण सात्विक क्रिया से सम्बंधित है । इन मार्गों का चयन आपके गुरु से जुड़ा होता है । जिस मार्ग का अनुयाई आपका गुरु हो उसी मार्ग पर शिष्य को चलना चाहिए । हम अपने अनुभव के आधार पे बतायें तो बलि प्रथा नहीं होनी चाहिए । किसी भी जीव की हत्या से कोई साधना पूर्ण नहीं होती, बलि प्रथा से जुड़े लोगों की बहुत ही दर्दनाक मृत्यु होती है ।
प्राचीन काल में इंसान की भी बलि का प्रचलन था , ये और भी भयावह होता था 11 वर्ष तक के बालक की बलि दी जाती थी । कुछ लोग तो प्रौढ़ इंसान की भी बलि देते थे । पर इसका अभिशाप आज तक भोग रहे जिन राजाओं के यहां या जिन परिवार में नर बलि हुई थी 1 या 2 पीढ़ी के बाद उनका वंश समाप्त हो गया । क्यो की ऐसे परिवार में कुल पिशाच हो जाता है। जिनके परिवार में नर बलि होती है। 95% तो जब बलि बंद होती है, तो वंश नहीं चलता और अगर चला भी तो उस वंश के लोग प्रेत ही बनते है। उनका उद्धार नही होता वो पिशाच ही बनते है । क्यों कि जिनकी बलि दी जा चुकी है, उनमें प्रतिशोध की भावना के साथ प्राण का परित्याग किया है, तो "अन्ते मति सा गती" मतलब मृत्यु के समय जहां मति होती है वही रहता है । अर्थात वो आत्मा रूपी पिशाच न तो आपका वंश चलने देगा न ही सुखी रहने देगा । हाँ इससे बचने का मात्र एक साधन है। मांसाहार न करो और उस स्थान को छोड़ धर्म करो यदि आप धर्म करते हो और मांस भी नहीं खाते तो वंश चल सकता है पर उद्धार नही होगा । इस लिए जिसके वंश में ये हुआ है । उनको उस स्थान को छोड़ के धर्म करें और कभी मांसाहार न करें तभी बच सकते है ।
हम अपने बटुक साधकों को बता दें कि बटुक भैरव साधना में तीन मार्ग होते है 1 - बलि प्रथा । जिसका हम खण्डन करते है ये कोई आवश्यक नहीं कि बटुक साधना में बिना बलि के बाबा प्रसन्न नहीं होते ये भगवान शिव का बाल रूप है ऐसी कोई आवश्यकता है ।
2 - इस मार्ग में सेवा भाव देख के चलना होता है । बाबा की बच्चे की भाँति सेवा करनी होती है जो खाओ वही भोग लगाओ । बाबा को मदिरा बहुत प्रिय है । मदिरा का भोग आवश्यक है । साथ ही जो भोजन हमे फीका लगे पसंद न आये उसका भोग न लगायें । रात्रि पूजा में कभी रुकावट नही आनी चाहिए  ।
3 - ये पूर्ण दक्षिण मार्ग वालों के लिए है । आप सात्विक पूजन और भोग भी सात्विक करेंगे । मदिरा के स्थान पर खीर का भोग लगायेंगे । ये पूजन केवल अपनी किसी पूजा के रक्षा के लिए है , इससे सिद्धि नहीं प्राप्त हो पाती ।
विशेष आप जिस गुरु या पीठ से जुड़े है उसी के अनुसार सेवा करें । साथ ही यदि ब्राह्मण है तो मांस को ओंठ से स्पर्श न होने दें अन्यथा आप ब्राह्मण नहीं रह जायेंगे। वैसे भक्त में दया का भाव होना चाहिए इस लिए मांस से सदैव दूर ही रहना चाहिए ।

Thursday, 31 August 2017

दहेज़ लेने से समस्त पुण्य हो जाते है नष्ट

आज हम हिन्दू धर्म के 15वें संस्कार विवाह से जुड़ी कुछ बातों के बारे बताते है । वैसे हिन्दू धर्म में 8 प्रकार के विवाह होते है । जिनका शास्त्रों में वर्णन है, ब्रह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस, पिशाच ,, ये आठ प्रकार के विवाह होते है ।
1- पढ़े लिखे को वस्त्र आभूषण पहना कर पूजन करके कन्या दान करने को ब्रह्म विवाह 2- वेद पाठी, यज्ञ करने वाले को वस्त्र आभूषण  देकर पूजन करके कन्या दान को दैव विवाह
3- गाय बैल, घोड़े के जोड़े देकर विधि पूर्वक कन्या दान करना आर्ष विवाह है ।
4- दोनों पक्ष के लोग यह कहें कि दोनों खूब धर्म करो और पूजन के साथ कन्या दान करें यह प्राजापत्य विवाह है।
5- कन्या पक्ष की शक्ति के आधार पर उनकी प्रशन्नता से  वरपक्ष दान लेकर विवाह करे आसुर विवाह है।
वैसे इस प्रकार से भी इस विवाह को निन्दित ही कहा गया है, जब ये निन्दित है तो आज के समाज में विवाह नही व्यापार हो गया है, लड़की का जन्म होना श्राप हो गया है । कोई भी व्यक्ति ये नही चाहता कि उसे लड़की हो उसका कारण है ! दहेज समाज का ऐसा विष है जो कि धर्म को भी धूमिल करता है । देखा जाय तो विवाह दोनों पक्ष करते है। पर वर पक्ष की दृष्टि यही रहती है कि पूरे विवाह का खर्च ले और साथ साथ उनके ऊपर जिन्दगी भर का भार थोप दें । ये आज के विवाह की मंसा हो गई है । अनपढ़ ही नहीं पढ़े लिखे भी इस श्रेणी में आगे रहते है । परंतु जहां पर कन्या पक्ष से अत्यधिक मांग से विवाह होता है इसे एक दम निन्दनीय कहा गया है । ऐसे विवाह से दोनों पक्ष पाप की दृष्टि में आते है । जितना मांगने वाला दोषी है उतना ही देने वाला क्यों कि ऐसे विवाह में कोई देवता साक्षी नहीं बनता । क्यों कि किसी पे मन मानी बल का प्रयोग होता है तो वह अधर्म की श्रेणी में आ जाता है । और जहां अधर्म हो रहा वहां कोई देव नहीं आता । दहेज देना लेना दोनों ही पाप है , कितना भी धर्म करो इससे मुक्ति नहीं मिलती । दोनों पक्ष के लोग जो संकल्प लेते देते है , वो और वर वधू चारो ही पाप की श्रेणी में आते है । इस लिए कन्या पक्ष जितना अपनी इच्छा से दे उतना ही लेना चाहिए । कुछ लोग इसको कहते है कि जो कन्या के विवाह में नही देता वह अपनी लड़की को समझो बेच दिया, तो ये सर्वथा गलत है । बल कि कन्या पक्ष को तो कन्या दान का फल मिलता ही है साथ वर पक्ष भी पुण्य की दृष्टि में आ जाते है। प्रमाण -
यासां नाददते शुल्कं ज्ञातव्यो न स विक्रयः ।
अर्हणं तत्कुमारीणानृशंस्यं च केवलम् ।।
जातिवाले जिन कन्याओं पर शुल्क नहीं लेते वह बेचना नही है । वह तो कन्याओं का पूजन और हिंसारहित कर्म है , अर्थात दया का काम है ।।
6- कन्या और वर अपनी इच्छा से संबंध बनाते है उसे गंधर्व विवाह कहते है ।
7- लड़की के घर वालों को मार कर या उनके शरीर को चोट पहुंचा कर जो लड़की को उठा ले जाता है यह राक्षसी विवाह है ।
8- सोती हुई को लड़की बेहोश किया जाय या बल का प्रयोग करके सम्बन्ध बनाया जाय यह पिशाच विवाह में आता है । अन्तिम दोनों को शास्त्रों में निन्दनीय कहा है ऐसा करने वाला महा पापी होता है वह कितना भी धर्म दान कर ले उसे 1000 वर्ष की पिशाच योनि में भोगना पड़ता है । ऐसे लोगों के हाँथ जल भी नही ग्रहण करना चाहिए ।।
ब्रह्म, दैव, प्राजापत्य, और गान्धर्व ये चार विवाह उत्तम और अच्छे बताये गए है । इनके अतिरिक्त चारो विवाह त्याज्य है ।
कन्या की इच्छा से वर के हाँथ में कन्या का हाँथ देने से पाणिग्रहण संस्कार है होता इसी से विवाह पूर्ण होता है या कहिये मान्य होता है ।
यदि आज के समय की बात करें , जो हो रहा है तो विवाह में अधिकधिक धन का व्यय किया जाता है कि विवाह हो रहा है । आये हुए लोगों पर अनावश्यक धन का व्यय होता है । जब कि आवाहित देवता के ऊपर अक्षत मात्र से ध्यान कर लिया जाता है कि कितनी जल्दी पूजन समाप्त हो, बिचार करिये जिसको अपने साक्षी माना विवाह किया उनको तो आपने समय ही नही दिया । क्या होगा ऐसे विवाह का भविष्य?, इस लिए जो करिये अच्छे से नही तो नही । वैसे भी इसी लिए गान्धर्व विवाह को उत्तम बताया गया क्यो की उसमें दान दहेज नहीं चलता । जिन विवाहों में वर पक्ष की इच्छा से दान लिया जाता है । उस विवाह को आसुर विवाह ही कहा जायेगा आसुर विवाह और पिशाच विवाह के मिलने वाले पाप एक जैसे ही है । इस लिए दहेज नही लेना चाहिए ।


Wednesday, 30 August 2017

इंसान कभी भगवान नहीं होता ......,

प्रत्येक वह व्यक्ति जो भक्ति करता है , उसकी यही मंसा होती है कि मृत्योपरांत हमें मुक्ति की प्राप्ति हो । और इस भावना से वह गुरु के शरण में जाता है । हमें भगवत् मार्ग का अवलोकन कराइये और गुरु अपने ज्ञान के अनुसार मार्ग बताता है । परन्तु सबसे महत्वपूर्ण बात क्या उस गुरु को पता है ? कि मुक्ति का मार्ग क्या है ? व्यक्ति यहीं पर जल्द बाजी कर जाता है । कुछ लोग वंसानुगत गुरु से दिक्षा ले लेते है। वैसे ये गलत नही पर शिष्य का कर्तव्य होता है कि जिससे आप दिक्षा ले रहे क्या उसे उस देवी देवता के बारे में पता है । क्या वो संध्या पूजन या साधना करता है या नहीं ये जानना आवश्यक है । आज के समय में कुछ गुरु बानें घूम रहे जो स्वयं को ही परमात्मा का अवतार बताते है । अपनी ही पूजा कराते अपनी रामायण तक बना डाले है । और सबसे आश्चर्य की बात ये है कि व्यक्ति उनके इस मिथ्या भाषण को सत्य मान लेता है । शास्त्रों का मत है जो मनुष्य अपनी पूजा कराता है वह प्रेत बनता है। और जो उनकी पूजा करता है वह प्रेत ही बनता है , क्यो की उद्धार करने का कार्य परमात्मा का है इंसान का नही । बहुतायत लोग मृत लोगों की उपासना करते है । वैसे मृत की उपासना होती है ऐसा नहीं है कि नहीं होती । पर बात ये आजाती है कि वो आपका कौन है । माता पिता या गुरु इनको प्रणाम कर सकते है इसके अतिरिक्त यदि किसी सन्यासी की समाधि है तो प्रणाम कर सकते है । पर कुछ लोग जहां पाते है वहीं सर झुकने लगते है हाँथ जोड़ने लगते है । एक कहावत है "जो हर जगह झुकता है उसे जीवन पर्यन्त झुक के ही रहना पड़ता है" हम सनातन है तो सनातन धर्म के नियम अनुसार ही पूजन और वन्दना करनी चाहिए । सनातन धर्म कहता है इंशान की वन्दना नही करनी चाहिए । चाहे वह जीवित इंशान हो या मृत, इंसान की उपासना नही करनी चाहिए । इंशान कभी भगवान नही बन सकता । खुद सोचिए आदि शंकराचार्य जी जैसे महा संत जिन्होंने केवल देव पूजन और धर्म का उपदेश ही दिया । इतने बड़े सिद्ध संत ने कभी अपने को भगवान नही कहा । इसी बात को भगवान ने गीता में कहा -
यान्ति देवव्रता देवान् पितृन्यान्ति पितृव्रताः।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोsपि माम् ।। ( गीता नवम अध्याय )
अर्थात् - देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते है, पितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं।भूत प्रेतों को पूजने वाले भूतों प्रेतों को प्राप्त होते है और मेरा पूजन करने वाले भक्त हमको प्राप्त होते है ।
कुल सार सर्वस्व ये है कि मनुष्य को कभी किसी मनुष्य की उपासना नही करनी चाहिए ।
चाहे वह मृत हो या जीवित मनुष्य गुरु बन सकता है भगवान नही । भगवत मार्ग दिखाये तो गुरु है और खुद को ईश्वर बताये तो राक्षस है ।

Tuesday, 29 August 2017

गुरु के प्रकार

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में माता पिता प्रथम गुरु होते है । माता, पिता, गुरु यही तीन ऋण भी होते है , जब तक ये तीन जीवित हो सेवा करे सानिध्य या ज्ञान ले । परन्तु माता पिता को छोड़ गुरू का चयन बहुत ज़रूरी होता । क्यों की गुरू के पुण्य से शिष्य सिद्ध होता है परमात्मा के निकट पहुँचता है तो गुरू यदि कोई पाप करे तो शिष्य को भी मिलता । इस लिए यदि गुरू में कमी दिखे तो उसका परित्याग कर देना चाहिए। शास्त्र का मत यहाँ तक है कि यदि आपका गुरू ब्राह्मण और आप किसी भी जाति के हो तो आपके धर्म का मूल्याँकन उसी ब्राह्मण गोत्र से किया जायेगा और यदि आपने किसी और जाति के गुरू से मन्त्र लिया तो आपके धर्म का भी मूल्याँकन उसी जाति से होगा । संत की जाति नहीं होती पर वह संत भगवान या कहें दैविक मार्ग का अनुयाई होना आवश्यक होता । वेद वेदान्त उपनिषद का ज्ञान आवश्यक है । किसी को भी आध्यात्मिक या कहिये ज्ञान वर्धक गुरु बनाना चाहिये । हिन्दू धर्म वेदों पर आधारित है इस लिये गुरू को वैदिक ज्ञान होना आवश्यक है । तभी वह अपने साथ साथ शिष्य का भी उद्धार करता है । गु = अन्धकार, रु = प्रकाश की तरफ ले जाने वाला। गुरु कई हो सकते है वैसे गुरु के 3 प्रकार है 1 शैक्षिक - जो आपको पढ़ता है । 2 - मार्गिक - जो आपको बक़ताये ये सही है ये गलत है। दूसरे में ही आ जाते है कथा वक्ता प्रवचन करने वाले । जो हमारे बड़े रिस्तेदार होते है । या कोई भी हो सकता है । 3 - दैविक - वो गुरु जो मुक्ति का मार्ग प्रसस्त करे । आपको गुप्त मंत्र देकर आपका मार्ग निर्धारित करे । जिसको वेदों शास्त्रों का ज्ञान हो । या जैसे आप कोई साधना कर रहे हो तो उस साधना को उन्होंने किया हो और उस मार्ग के बारे में सम्यक जानकारी हो ऐसा गुरु ।
शास्त्र कहते है प्रथम दो प्रकार के जो गुरु है उन्हें समय आने पर छोड़ देना चाहिए जब जक वो पढ़ायें या कथा कहे उपदेश दे तभी तक के लिए उनकी सेवा करो सम्मान करो उसके बाद नहीं । मनु स्मृति कहती है -
अब्रह्मणादध्ययनमापत्काले विधीयते ।
अनुव्रज्या च शुश्रूषा यावदध्ययनं गुरो।।
अर्थात - जब दैवज्ञब्राह्मण गुरु का सानिध्य न हो, आपात काल हो क्षत्री आदि ( क्षत्री, वैश्य, शूद्र, और भी किसी से ) से भी पढ़ा या ज्ञान लिया जा सकता है । परंतु उस गुरु का अनुगमन और सेवा तब तक ही करे जब तक वह पढ़ता रहे या सीखता रहे ।
उसके बाद उसका गुरु रूप से नही मनना चाहिए ।

Monday, 28 August 2017

ज्ञान और संस्कार ये कहीं से भी प्राप्त हो उसे ग्रहण करना चाहिए

यदि हमें जीवन मे कुछ प्राप्त करना है, तो शिक्षा देने वाला नीच हो तब भी विद्या अध्ययन अवश्य सीखना चाहिए। चाण्डाल के पास से भी परम धर्म के मार्ग का अवलोकन करना चाहिए , और उसे ग्रहण करना चाहिए । अच्छे आचरण और मर्यादित सुन्दर स्त्रीरत्न को नीच कुल से भी ग्रहण कर लेना चाहिए । "क्यो की स्त्री जाति और कुल से नहीं गुण और सुन्दरता से सम्मानित होती है " ऐसी स्त्री मिले तो रत्न के सदृश मान कर ग्रहण करें । दुर्गुण में भी गुण खोज कर ग्रहण करें , बालक को न देखो यदि सुन्दर प्रिय वचन नही है तो बेकार है , और यदि इसके विपरीत होतो सुन्दर वचन से बालक को ग्रहण करो, शत्रु के भी गुण देखना चाहिए यदि अच्छे हों तो उसे ग्रहण करो, कितना भी अशुद्ध स्थान पे स्वर्ण गिर जाये उसे ग्रहण करना चहिये।। शास्त्र प्रमाण -
श्रद्दधानः शुभं विद्यामाददीतावरादपि।
अन्त्यादपि परं धर्मे स्त्रीरत्नं  दुष्कुलादपि।।
विषादप्यमृतं ग्राह्यं बालादपि सुभाषितम् ।
अमित्रादपि सद्दृत्तममेध्यापि काञ्चनम् ।।
श्रद्धापूर्वक नीच से अच्छी विद्या को, चाण्डाल से भी परम धर्म को, और नीच कुलसे भी  स्त्रीरत्न को ग्रहण करै। विष से भी अमृत को, बालक से सुन्दर वचन को, वैरी से भी सुन्दर आचरण को, अशुद्ध स्थान से भी सुवर्ण को लेना चाहिए ।
"स्त्रियो रत्नान्यथो विद्या धर्म: शौचं सुभाषितम्।
विविधानि च शिल्पानि समादेयानि सर्वतः।।
अर्थात - स्त्री को, रत्न, विद्या, धर्म, पवित्रता, सुन्दर वचन और अनेक प्रकार की कारीगरी इनको सबसे लेना चाहिए ।

Sunday, 27 August 2017

व्यक्ति आयु से नही ज्ञान से बड़ा होता है

किसी भी व्यक्ति का बाल पका हो अवस्था हो गई हो, पढ़ा लिखा न हो या पढ़ा लिखा हो कर भी दूसरे का देख कर ही कार्य करे। विवेक का प्रयोग न करे तो वह बड़ा नहीं होता उसकी सलाह से नहीं चलना चाहिए । आयु में कम हो पढ़ा लिखा हो विवेक का प्रयोग करता हो मात्र दूसरों को न देखे अपने विवेक से निर्णय ले ऐसा व्यक्ति कम आयु का हो, तरुण अवस्था में भी हो तो उसे देवता भी वृद्ध मानते है । "दूसरों को देखने का हमारा भावार्थ ये नहीं कि दूसरों को नही देखना चाहिए या उनसे सीखना नही चाहिए । हमारा कहने का अभिप्राय है कि अनुभव लेना चाहिए ये बुद्धिमान का धर्म है । पर उसमें भविष्य को लेकर समझने की क्षमता हो कि इसका भविष्य में क्या फल होगा, मात्र वर्तमान और भूत में बीती बातों को ही प्रमाण मानें तो वह सम्मानित व्यक्ति नही क्यों कि वह अपने साथ दूसरों का भी भविष्य अन्धकार में ले जाता है" ।
ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य कुल में जन्म लेने से भी कोई बड़ा नही होता बिना ज्ञान के वो मूर्ख ही होता है । जैसे ब्राह्मण को ज्ञान के लिए जाना जाता है , इस लिए ब्राह्मण के अन्दर प्रत्येक प्रकार का ज्ञान आवश्यक है । उसमें मुख्य रूप से श्रुति यानी वेद का ज्ञान, देवी देवताओं के पूजन का और यज्ञ का इसके साथ साथ वर्तमान समय में चल रही स्थिति के अनुसार हर क्षेत्र का ज्ञान जरूरी है । यदि ऐसा नहीं है तो वह नाम के लिए ब्राह्मण है । जैसे काठ का हाँथी और मृत चर्म का हिरण । इस लिए सबसे बड़ा ज्ञान है । इस बात को शास्त्रों ने इस प्रकार कहा-
न तेन बृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः ।
यो वै युवाप्यधीयानस्तं देवा स्थविरं विदुः ।।
यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः।
यश्च विप्रोsनधीयानस्त्रयस्ते नाम बिभ्रति।।
अर्थात - सिरके बाल सफेद होने से कोई बड़ा नही होता ।  जिसकी अभी कम युवा है, जवान है, तरुण अवस्था में पढ़ा लिखा हो उसे देवता भी वृद्ध समझते हैं।।
काठ का हांथी, चमड़े का हिरण और बिना पढ़ा ब्राह्मण ये तीनो केवल नाम ही धारण करते है इन्हें केवल नाम के लिए बुलाया जा सकता है , कि ये हांथी है ये मृग है ये ब्राह्मण है । पर उनका अस्तित्व नही के बराबर ही होता है ।